ঋগবেদীয় সন্ধ্যা - ऋगवेदीय संध्या - RIGVEDIYA SANDHYA
(উপনীত ঋগবেদী ব্রাম্মনগণ এই সন্ধ্যা করিবেন)
শুদ্ধাসনে বসিয়া দুইবার আচমন ও বিষ্ণু স্মরণ এবং জলশুদ্ধি ও আসন্শুদ্ধ্বী করিয়া নিন্ম লিখিত ছয়টি মন্ত্র পাঠ করিয়া মস্তকে প্রত্যেক জলের ছিটা দিবে I ইহাকে মার্জন বলে I এইরূপ প্রক্রিয়ার নাম আপোমার্জন বা মন্ত্র স্নান
আচমন
আচমন কোন দৈব কর্ম্মে বা পিতৃ কর্ম্মে প্রথমেই আচমন করিতে হয় I ভুলে আচমন না করিয়া যদি কোন কার্য্য করা হয়, তাহা হইলে সেই কার্য্যে কোন ফল হয়না I কর্ম সমাপ্তির পরেও আচমন করার বিধি আছে I
আচমনের নিয়ম - आचमन्यश्य नियम्: - How to perform Aachaman
বৈধ কর্মানুস্ঠানের পূর্ব্বে তিনবার জল পান করিয়া অষ্টাঙ্গ স্পর্শরূপ কার্যের নাম আচমন I আচমন সময়ে হাত পা ধুইয়া বাঁ হাতে কোশা হইতে ডান হাত গোকর্নাকৃতি করিয়া ( মাঝের তিনটি আঙ্গুল একত্র ও উর্দ্ধমুখ করিয়া এবং কনিষ্ঠা ও অঙ্গুষ্ঠ প্রসারিত করিয়া ) তাহাতে (ব্রাম্মতির্থে) একটি মাসকলাই মাত্র ডুবিতে পারে, এই পরিমান জল লইয়া তাহা দেখিতে দেখিতে ও বিষ্ণুস্মরণ করিতে করিতে তিনবার ঐ জল পান করিবে I দ্বিজাতিগনের আচমন মন্ত্র :-
ॐ विष्णु, ॐ विष्णु, ॐ विष्णु I
ॐ तद्विष्णु परमंग पदंग सदा पश्यन्ति सुरय: दिविब चक्षुराततम I
তারপর হাত ধুইয়া অঙ্গুষ্ঠ মূল দ্বারা ওষ্ঠাধর দুইবার মার্জন করিয়া পুনর্বার তর্জনী, মধ্যমা ও অনামিকা মিলিত করিয়া তাহাদের অগ্রভাগ দ্বারা মুখ স্পর্শ করিবে I পরে হাত ধুইয়া অঙ্গুষ্ঠ ও তর্জনী মিলিত করিয়া তাদের অগ্রভাগ দ্বারা নাসিকার ছিদ্র দুইটি অর্থাৎ প্রথমে দক্ষিন নাসাপুট, তাহার পর বাম নাসাপুট স্পর্শ করিবে I তারপর অঙ্গুষ্ঠ ও অনামিকার অগ্রভাগ দ্বারা দক্ষিন নেত্র ও বাম নেত্র এবং সেই অঙ্গুলির অগ্রভাগ দ্বারা দক্ষিন ও বাম কর্ণ এবং অঙ্গুষ্ঠ ও কনিস্ঠার অগ্র ভাগ দ্বারা নাভি স্পর্শ করিয়া হাত ধুইবে এবং করতল দ্বারা হৃদয় ও দক্ষিন হস্তের সমস্ত অঙ্গুলি দ্বারা মস্তক এবং ঐ সকল অঙ্গুলির অগ্র ভাগ দ্বারা দক্ষিন ও বাম স্কন্ধ স্পর্শ করিবে I
আচ্মনান্তে বিষ্ণু স্মরণ করিতে হয় I মন্ত্র যথা:- ॐ (শুদ্র হইলে ঔম স্থলে নম: বলিবে) सर्बमंगलमंगल्यंग वरेन्यंग वरदंग शुभम I नारायनंग
नमस्कृत्य सर्ब कर्माणि कारयेत I ॐ (नम:) शंकचक्रधरंग विष्णुंग दीभुजंग पीतबाससम I प्रारम्भे कर्मनांग विप्र: पुन्डरीकङ स्मरेद्धरिम II
ॐ (नम:) अपवित्र पवित्रोबा सर्बाबस्थाङ
गतोह्पी बा य: स्मरेत पुन्डरिकाक्षङ स बाय्हाभ्यन्तरे शुची: ॐ माधबो माधबो बाची माधबो माधबो हृदी स्मरन्ती साधव्: सर्बे सर्ब कार्येषु माधबम II
কার্য্য করিতে করিতে অন্য কথা বলিলে ("নমো বিষ্ণু:") नमो विष्णु: মন্ত্রে বিষ্ণু স্মরণ করিবে I
জলশুদ্ধি ও আসন্শুদ্ধ্বী
ঔম নমো নারাযনায় এই মন্ত্র বলিয়া চারিদিকে এক হস্ত পরিমিত স্থান লইয়া চতুষ্কোণ মণ্ডল করিয়া অঙ্কুশ মুদ্রা দ্বারা নিন্মলিখিত মন্ত্রে জল্শুদ্দ্বী করিবে I
–“ ॐ गंगेच यमुने चैब गोदावरी सरस्वती I नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन सन्निधिंग कुरु I”
চন্দন সমেত একটি ফুল হাতে লইয়া " ॐ ह्रिंग आधारशक्ति कमालासनाय नम:" এই মন্ত্র বলিয়া আসনের উপর ফুলটি দিয়া আসন স্পর্শ করিয়া নিন্ম লিখিত মন্ত্র বলিবে I যথা:-
आसनमन्त्रश्य मेरुपृस्ठ ऋषि सुतलङ छन्द: कुर्मोदेवता आसनोपबेसने विनियोग्: I ॐ पृत्वी त्वया धृता लोका देवित्वङ विष्नुना धृता त्वन्च धारय
माङ नित्यङ पबित्रम कुरु चसनम II
পরে জোড় হাতে বামে ঝুকিয়া –
ॐ गुरुभ्यो नम:, ॐ परम्गुरुभ्यो नम: , ॐ परापरगुरुभ्यो नम:, ॐ परमेष्ठी गुरुभ्यो नम:
মার্জন – मार्जन- MAARJON
ॐ शन्न आपो धन्वन्या:, शमु न: सन्त्व नुप्या: I शन्न: समुद्रिया आपः शमन: सन्तु कुप्याः II १ II
ॐ द्रुपदादिब मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिब I पुतंग पबित्रेने, बाज्यमापः शुद्धन्तु मैनसः II २ II
ॐ आपो हिष्ठा मयो भुबस्था न उर्ज्जे दधातन I महेरणाय चक्ष्से II ३ II
ॐ यो व:शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न: I उशतीरिब मातर्: II ४ II
ॐ तस्मा अरंगामं वो, यस्य क्षयाय जिन्वथ I आपो जनयथा च न: II ५ II
ॐ ऋतन्च सत्यन्चाभिद्वात्तपशो अध्यजायत I ततो रात्र्यजायत, तत्: समुद्रो अर्नब्: II
প্রাণায়াম
প্রথমে আপনার চারিদিকে দক্ষিনাবর্ত্তে জলদ্বারা বেষ্টন করিয়া জোড়হাতে নিন্মিলিখিত মন্ত্র সকল পাঠ করিবে I
ॐकारस्य ब्रम्म्ऋषिरग्निर्द्देवता गायत्रीक्क्छन्द: सर्व कर्मारम्भे विनियोग्: II
सप्तब्याहृतीनाङ विश्वमित्र -जमदग्नि-भरद्वाज्-गौतमातृ-वशिष्ठ्-गौतम कश्यपा ऋषय: अग्निवायादित्य
वृहष्पतिवरुणेद्र विश्वदेवा देवता: गायक्रष्निगनुष्टुब वृहतीपङ्त्ति-तृष्टुब जगत्यश्छ्दाङ्शी प्रानायामे विनियोग्: II
ॐ सावित्र्या बिश्वामित्र ऋषी सविता देवता गयत्रीछन्द: प्रानायामे विनियोग्: II
गायत्री शिरस्: प्रजापती ऋषिर्ब्रम्माग्निवायुरादित्या देवता गायत्रीछन्द: प्रानायामे विनियोग्:II
তারপর দক্ষিন হস্তে পৈতা সহ বৃদ্ধাঙ্গুষ্ঠ দ্বারা দক্ষিন নাসা টিপিয়া বাম নাসা দ্বারা শ্বাস গ্রহণ করিতে করিতে নিন্মলিখিত মন্ত্রোচ্চারণ করিবে:-
ॐ हंग्सस्थंग द्वीभुजंग रक्त साक्ष सूत्रकमन्डुलुम I
चतुर्मुखमहङ वन्दे ब्रम्माणङ नाभिमन्डले II
ॐ भु: ॐ भुभ: ॐ स्व:
ॐ मह: ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्य: I
ॐ तत्सविर्तुर्व्व्रेण्यङ भर्गोदेव्स्यधीमही धीयो यो न: प्रचोदयात II
ॐ आपो ज्योती रसोअम्रितंग ब्रम्म भुर्भुभव: स्वरों II
তারপর অনামিকা ও কনিষ্ঠা দ্বারা বাম নাসা টিপিয়া নিন্ম লিখিত মন্ত্রে বিষ্ণুর ধ্যান করত: বায়ু নিরোধরূপ কুম্ভক করিবে :-
ॐ शंख चक्र गदापद्मधरंग गरुड़ बाहनम I
हृदि नीलोत्पलश्यामंग विष्णु वन्दे चतुर्भुजम II
ॐ भु: ॐ भुभ: ॐ स्व:
ॐ मह: ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्य: I
ॐ तत्सविर्तुर्व्व्रेण्यङ भर्गोदेव्स्यधीमही धीयो यो न: प्रचोदयात II
ॐ आपो ज्योती रसोअम्रितंग ब्रम्म भुर्भुभव: स्वरों II
তারপর দক্ষিন নাসা হইতে বৃদ্ধাঙ্গুষ্ঠ সরাইয়া লইয়া ঐ নাসা দ্বারা শ্বাস ত্যাগ করিতে করিতে নিন্ম লিখিত মন্ত্রে শিবকে মনে মনে ধ্যান করিবে I
মন্ত্র, যথা:- ॐ श्वेतंग त्रिशूल- डम्बरु करमर्द्धेंदु भुषितम I
त्रिलोचनंग ब्याघ्र चर्म परिधानंग बृषासनम I
ललाटे चिन्तयंग शम्भू देवंग भुजगभूषनम II
ॐ भु: ॐ भुभ: ॐ स्व:
ॐ मह: ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्य: I
ॐ तत्सविर्तुर्व्व्रेण्यङ भर्गोदेव्स्यधीमही धीयो यो न: प्रचोदयात II
ॐ आपो ज्योती रसोअम्रितंग ब्रम्म भुर्भुभव: स्वरों II
পুনন্মার্জন – पुनन्मार्जन- PUNANMAARJAN
অঙ্কুশ মুদ্রায় (ডান হাত চিত করিয়া তর্জনী, অনামিকা ও কনিষ্ট অঙ্গুলি মুডিয়া, মধ্যমাকে একটু বাঁকা করিয়া, বাঁকা অংশ জলে রাখিয়া ) নিন্মোক্ত মন্ত্র পাঠ করিবে :
“ ॐ गंगेच यमुने चैब गोदावरी सरस्वती I नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन सन्निधिंग कुरु I”
পরে ওই জল নিন্ম লিখিত মন্ত্রে নিজের মস্তকে ছিটাইবে I
মন্ত্র, যথা:-
आपोहि हि-स्टेति ऋक्त्रयस्य सिन्धुद्बिप ऋषिरगायत्रीच्हन्दो आपो देवता मार्जने विनियोग: II ॐ आपो हिस्ठा मयो भुव: I ॐ ता न उर्ज्जे
दधातन, ॐ महे रणाय चक्षशे I ॐ षो व: शिवतमोरस:, ॐ तस्य भाजयेतेह न: I ॐ उशतीरीब मातर: I ॐ तस्मा अरंगमाम वो, यस्य
क्षयाय जिन्वथ आपो जनयथा च न: II (এই মন্ত্রে মস্তকে জলের ছিটা দিবে)I
আচমন
আচমনীয় জলে কায়্মনবাক্যসম্ভূত পাপের মিশ্রণ চিন্তা করিয়া .উহা হৃদযস্থ তেজ:পদার্থে নিক্ষেপ করিতে হয় I ইহার দ্বারা বাকযন্ত্র আপ্যায়িত হয় অর্থাৎ উহার সংকোচ ও সুষ্কতা অন্তর্হিত হইয়া যায় এবং বিসদরূপে মন্ত্রোচ্চারণ করিবার শক্তি জন্মে I এইরূপে জলপানের পর চক্ষু কর্নাদি ইন্দ্রিযসকল স্পর্শ করিবার বিধি আছে I তাহার কারণ এই যে, আদ্র ইন্দ্রিয় সকল স্পৃষ্ট হইলে, তত্তত ইন্দ্রিয়ের শান্তিবিধান হয় I
প্রাত: সন্ধ্যার আচমন মন্ত্র –
सुर्याश्च मेति मंत्रश्य ब्रम्म ऋषि प्रकितिश्छंद: आपो देवता आचमने विनियोग: I ॐ सुर्याश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्य:
पापेभ्यो रक्षताम I यदात्रीया (यद्रात्र्या) पापम्कार्यम मनसा बाचा हस्ताभ्यांग पद्भ्यामुदरेन शिश्ना अहस्थद्बलुस्पतु I
यतकिंचितद्दुरितंग मयी इदमहमापो अम्रितयोनौ सूर्यो ज्योतिशी परमात्मनि जुहोमि स्वाहा: I
মন্ত্রের অর্থ - "সুর্যাস্চ মা" ইত্যাদি মন্ত্রের ঋষি ব্রম্মা, ছন্দ: প্রকৃতি দেবতা জল এবং আচমনে I
আমাকে সূর্য, মন্ন্যু, (যজ্ঞ বা ক্রোধ) ও তাহার অধিপতিগন, মনুষ্যজনিত পাপ হইতে আমাকে রক্ষা করুন I রাত্রিতে আমি মন, বাক্য, হস্ত, পদ, উদর ইত্যাদি দ্বারা যে পাপ করিয়াছি তাহা নষ্ট করুন I আমার যত পাপ এবং সেই সকল কর্তা আমাকে আমি অমৃতের খনি জ্যোতির্ময় সূর্যে আহুতি দিতেছি I
মধ্যাহ্ন সন্ধ্যার আচমন মন্ত্র –
आप:पुनस्थिती मन्त्रश्य विश्नुहृषीअनुप्स्टुप्छंद: आपो देवता आचमने विनियोग: I ॐ आप: पुनन्तु पृथिवीङ्, पृथ्वी पुता पुनातु माम I
पुनन्तु ब्राम्म्न्स्प्तिर्ब्रम्म पुता पुनातु माम I यदुछिस्टम्भोज्यन्च्: यद वा डुश्चरितङ मम I सर्बङ पुनन्तु मामापोअसतन्च प्रतिग्रहङ स्वाहा !!
মন্ত্রের অর্থ
জল পৃথিবীকে (দেহকে) পবিত্র করুন এবং পবিত্র হইয়া পৃথিবী (বা দেহ) আমাকে (আমার জীবাত্মাকে) পবিত্র করুন I জল বেদধ্যাপককে পবিত্র করুন, এবং বেদ পবিত্র হইয়া আমাকে পবিত্র করুন I উচ্ছিষ্ট, অভোজ্য, অসদাচরণ এবং অসৎ প্রতিগ্র্হ (দানগ্রহণ) জনিত আমার সকল পাপ জল নষ্ট করুন I
সাযং সন্ধ্যার আচমন মন্ত্র –
अग्निश्च मेति मन्त्रश्य रुद्र ऋषि प्रकृतिछन्द: आपो देवता आचमने विनियोग: I ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्न्युपतयश्च I मन्न्युकृतेभ्य:
पापेभ्योरक्ष्ताम I यदन्हा पापम्कार्यम मनसा बाचा हस्ताभ्याङ पद्भ्यामुदरेन शिश्ना रातृस्तदबलम्प्तु, यद्किन्चिद्दुरितंग मयी I इदम्हंग
मा म्रितयोनौ सत्ये ज्योतिषी जोहोमी परमात्मनि स्वाहा II
"অগ্নিশ্চ মা" ইত্যাদি মন্ত্রের অর্থ ঋষী রুদ্র, ছন্দ: প্রভৃতি দেবতা জল এবং প্রয়োগ আচমনে I
পুনন্মার্জন – पुनन्मार्जन- PUNANMAARJAN
ॐ (বলিয়া মস্তকে জলের ছিটা দিবে ) भुर्भुव:स्व्: (বলিয়া মস্তকে জলের ছিটা দিবে ) तत्सवितुर्वरेनियम भर्गोदेवश्य धिमही धियो यो न:
प्रचोदयात (বলিয়া মস্তকে জলের ছিটা দিবে) ঋস্যাদি সহ নিন্মলিখিত মন্ত্রে মস্তকে বারত্রয় জল দিবেন I
आपो हि-ष्ठेती नव्वर्चस्य सुक्तस्य सिन्धुद्वीप ऋषिरापोदेवता; अन्त्ययोर्नुष्टुप शिष्टानङ गायत्रीछन्द: मार्जने विनियोग्:II
ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवस्तान उर्ज्जे दधातन मोहे रणाय चक्ष्से II
ॐ यो व शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न: उशतीरिब मातर: II
ॐ तस्मा अरंगमाम वो यस्य क्षयाय जिन्नथ I आपो जनयथा च न: II
ॐ शन्नो देवी रभिष्ट्य आपो भवन्तु पीतये I शंग यो रभि स्रवन्तु न: II
ॐ ईशाना वार्यानांग क्ष्यन्तीश्चर्षणीनाम I आपो याचामी भेषजम II
ॐ अप्सु सोमोत्नब्रबीदन्तबिर्श्वानी भेषजा I अग्निन्च बिश्व शम्भुबंग II
ॐ आप: पृणीत भेषजम वरुथ तन्वे मम I ज्योक च सुर्यंग दृशे II
ॐ इदमाप: प्रवहत्, यत्किन्च दुरितंग मयी I यद वाहमभिदुद्रोह यद वा शेप उतानृतम II
ॐ आपोअद्यान्वचारिषंग रसेन समगस्मही I पयस्वानग्न आगहि, त्वङ मा सङ्सृज वर्च्च्सा II
ॐ आपो ज्योती रसोअमृतम ब्रम्म भुभुर्भ्: स्वरों I
সুর্যোপস্থান – सुर्योपस्थान – SURYOPASTHAN
প্রাত: ও সাযং সন্ধ্যায় :-
ॐ असा वादित्यो ब्रम्म्:
(এই মন্ত্র বলিয়া প্রদক্ষিন করিয়া এক অঞ্জলি বা এক কুশী জল দিবে I)
মধ্যাহ্ন সন্ধ্যায় :- হাত উপর দিকে তুলিয়া নিন্ম লিখিত দুইটি মন্ত্র পাঠ করিবে I
ॐ उदुत्यमित्यस्य प्रस्कण्व ऋषी, सुर्यो देवता गायत्रीच्छन्द: सुर्योपस्थाने विनियोग्: I
ॐ उदुत्यंग जातवेदसंग देवंग वहन्ति केतव: I दृशे विश्वाय सूर्यम II
चित्रमित्रस्य कुत्स ऋषी सूर्यो देवता तृष्टुप्च्छन्द: सुर्योपस्थाने विनियोग्: II
ॐ चित्रंग देवानामुदगादनीकंग चक्षु स्मित्रस्य: वरुनास्यागने: I
आप्रा द्यावाप्रिथिभी अंतरिक्षंग, सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च II
গায়ত্রীর অঙ্গন্যাস - गायत्री अंगन्यास –GAAYATREE ANGNYAS
" गायत्य्रा विश्वामित्रऋषी: सविता देवता गायत्रीच्छंदो जपे विनियोग: " বলিয়া প্রথমে জল স্পর্শ করিয়া, তারপর আসনে জলের ছিটা দিয়া " ॐ भु: ॐ भुभ: ॐ स्व: ॐ मह: ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यंग I " বলিয়া আসনে বসিয়া পূর্ব্বের ন্যায় তিনবার প্রাণায়াম করিবে তারপর " ॐ भु: ॐ भुभ: ॐ स्व: ॐ मह: ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यंग " বলিয়া মস্তকে জলের ছিটা দিয়া " तत सवितुर्हृदयाय नम: " বলিয়া তর্জনী, মধ্যমা এবং অনামিকা দ্বারা হৃদয় স্পর্শ করিবে " वरेणियंग शिरसे स्वाहा " তর্জনী ও মধ্যমা দ্বারা মস্তক স্পর্শ করিবে " भर्गोदेव शिखायै वषट " বলিয়া অঙ্গুষ্ঠ দ্বারা শিখা স্পর্শ করিবে " स्य धीमहि कबचाय हुंग " বলিয়া দুই হাতে হৃদয় স্পর্শ করিবে " धियो यो नो नेत्रत्रयाय बौषट " বলিয়া বাম করতলের উপর দক্ষিন করতল চিত করিয়া রাখিয়া দক্ষিন হস্তের তর্জনী দ্বারা দক্ষিন চক্ষু:, মধ্যমা দ্বারা ললাট এবং অনামিকা দ্বারা বাম চক্ষু স্পর্শ করিবে " प्रचोदयादस्त्राय फट " বলিয়া দক্ষিন হস্ত ও মস্তকের চতুর্দ্দিকে ঘুরাইয়া দক্ষিন তর্জনী ও মধ্যমা বাম করতলে আঘাত করিবে I
গাযত্রীর ধ্যান - गायत्री ध्यान – GAAYATREE DHYAAN
(প্রাত:, মধ্যাহ্নে এবং সায়াহ্নে -प्रातर्मध्यान्ह्सायान्हेषु)
ॐ ऋगयजु:साम्-तृपदाङ तिर्यगुर्द्दाधरदिक्षु षट्कुक्षिङ पन्चशिरस्-मग्निमुखीङ ब्रम्मशिरस्काङ रुद्रशिखाङ विष्णुर्हृदया सुर्यमन्डलस्थाङ कौषेयबसनाङ
पद्मासनास्थाङ दन्डकमन्डल्वक्ष्सुत्राभयान्क-चतुर्भुजाङ शुभ्रवर्णाङ शुभ्राम्वरानुलेपन्-स्रगाभरणाङ्शरच्चन्द्र सहस्रप्रभाङ सर्व्वदेवमयीङ ध्याएत II
গায়ত্রীর আবাহন - गायत्री आवाहन – GAYATREE AAVAAHAN
জোড়হাতে নিন্ম লিখিত মন্ত্রে গাযত্রীর আবাহন করিবে I মন্ত্র, যথা :-
ॐ आगच्छे वरदे देवी जपोमे सन्निधा भव I गायंतंग त्रायसे यस्माद गायत्री त्वङ तत: स्मृता II
ॐ ओजोअसी सहोअसी वलमसी भ्राजोअसी देवानङ धामनामासी विश्वमसी विश्वायु: सर्व्वमसी सर्व्वायुर्भिभुरोम
गायत्रीमावाहयादी II
ॐ आयातु वरदे देवी अक्षरङ ब्रम्म्-स्मरितम I गायत्रीछन्दसाङ मातरिदङ ब्रम्म्जुषस्व न: II
ॐकारस्य ब्रम्म ऋषिरग्निदेवता गायत्रीच्छन्दो; महाव्याहृतानाङ परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषि: प्रजापतिर्देवता बृहतीच्छन्दो; गायत्रा विश्वमित्र ऋषि:
सविता देवता गायत्रीच्छन्दो,श्वेतो वर्ण: अग्निर्मुखङ्, ब्रम्मा शिरो, विष्णुर्हृदयङ्, रुद्रो ललातङ्, पृथिवी कुक्षिस्त्रैलोक्यङ चरणा:,सान्ख्यायनो गोत्रम्,
अशेषपापक्षयाय जपे विनियोग्: II
গায়ত্রী শাপোদ্বার
(গায়ত্রী জপের পূর্বে পাঠ্য)
गायत्र्या ब्रम्मशाप विमोचनमन्त्रश्य ब्रम्मऋसिरगायत्रीछंदों ब्रम्म देवता ब्रम्म्शाप-विमोचने विनियोग: I ॐ गायत्री त्वंग यद् ब्रम्मेती
ब्रम्मविदो विदुस्त्वाम पश्यन्ति धीरा: सुमनसो बा गायत्री त्वंग ब्रम्मशापद विमुक्ता भव: II गायत्रा वशिस्ठ शाप विमोचन मंत्रस्य
वशिस्ठ ऋषिर्नुस्ठुपछंदों ब्रम्म विष्णु रुद्रा देवता वशिस्ठ शाप विमोचने विनियोग: I ॐ अर्कज्योतिरंग ब्रम्मा ब्रम्म्ज्योतिरहंग शिव I
शिव ज्योतिरहंग विष्णु विष्णु ज्योतिरह: शिव: I गायत्री त्वंग वशिष्ठशापाद बिमुकता भव II गायत्र्या विश्वामित्रशापविमोचनमंत्रस्य
विश्वामित्र ऋषिर्नुस्ठुपछंदों गायत्री देवता विश्वामित्र शाप विमोचने विनियोग: I अहो देवी महादेवी विद्ये संध्ये सरस्वती I अजरे अमरे चैब
ब्रम्म्योनी नमोस्तुते I गायत्री त्वंग विश्वामित्रशापाद विमुक्ता भव II
গায়ত্রী – गायत्री - GAYATRI
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेन्यंग (तत्सवितुर्वरेनियम) भर्गोदेवष्य धीमहि, धीयो यो न: प्रचोदयात् ॐ II
প্রাতসন্ধ্যায় বুকের কাছে বাঁ হাত চিত করিয়া তাহার উপর ডান হাত চিত করিয়া রাখিয়া , মধ্যান্হ সন্ধ্যায় বুকের দিকে ডান হাত রাখিয়া তাহার উপর বাঁ হাত সেই ভাবে রাখিয়া , এবং সায়ংসান্ধ্যায় বুকের কাছে ডান হাত উপুড় করিয়া তাহার উপর বাঁ হাত উপুড় করিয়া রাখিয়া ডান হাতের অন্গুস্ঠে পৈতা জড়াইয়া ডান হাতেই জপ করিবে I
গায়ত্রী জপকালে অন্গুস্ঠের অগ্রপর্ব দ্বারা যথাক্রমে অনামিকার মধ্য ও মূলপর্ব. কনিস্ঠার মূল, মধ্য ও অগ্রপর্ব, অনামিকা ও মধ্যমার অগ্রপর্ব ও তর্জনীর অগ্র, মধ্য ও মূলপর্ব ধরিয়া জপ করিলে ১০ (দশ) বার জপ হইবে I প্রত্যেক অঙ্গুলির পর্ব অর্থাত গাট ও অগ্র ভাগ ধরিবেনা এবং অন্গুস্ঠের অগ্র পর্ব দিয়া ধরিবে, অগ্রভাগ দিয়া ধরিবেন I
আত্মরক্ষা- आत्मरक्षा-SELF DEFENCE
যজ্ঞ উপবীত (পৈতা) দক্ষিন হস্তের অন্গুস্ঠে জড়াইয়া দক্ষিন কর্ণের পিছন দিক স্পর্শ করিয়া নিন্মলিখিত মন্ত্র পাঠ করিবে I
ॐ जातवेदस इत्यस्य कश्यप ऋषिर्जातवेदा अग्निर्देवता स्ट्रिपछन्दो आत्मरक्ष्याम शान्त्यर्थजपे विनियोग: I
ॐ जातवेदसे सुनबाम सोममरातीयतो नि दहाती वेद: I स न: पर्षदति दुर्गानी विश्वा नाबेब सिन्धुंग दुरितात्यग्नि II
অত:পর নিন্ম লিখিত প্রত্যেকটি মন্ত্র পাঠ করিয়া নিজ মস্তকে জল দিবে :-
तच्छङ योरितास्य शंग्युऋषिर्विश्वदेवा देवताशक्करिच्छन्द:, नमो ब्रम्मने इत्यस्य प्रजापतिऋषि:र्विश्वदेवादेवता जगतिच्छन्द:शान्त्यर्थ्जपे
विनियोग्:I ॐ तच्छङ्यो रा बृणिमहे II
ॐ नमो ब्रम्मने नमो अस्त्वग्नये II
তারপর পুর্ব্বাদী দিক সমূহকে প্রনাম করিবে I
ॐ पुर्व्वादी दिग्भ्यो नम:, ॐ दिगीशेभ्यो नम:, ॐ सन्ध्याऐ नम:, ॐ गायत्रै नम:, ॐ सावित्रै नम:, ॐ सरस्वतै नम:. ॐ सर्भाभ्यो
देवताभ्यो नम: II
গায়ত্রীর বিসর্জন- गायत्री विसर्जन- GAAYATRI VISARJAN
গোকর্নাকৃতি দক্ষিন হস্তে এক গন্ডুষ জল লইয়া নিন্ম লিখিত মন্ত্রে জল ত্যাগ করিতে হইবে :
ॐ उत्तरे शिखरे देवी भुम्याङ पर्व्वत्मुर्द्दनी I
ब्राम्मणैरत्यनुज्ञाता गच्छ देवी यथा सुखम II
শান্তি – शान्ती
भद्रमित्यस्य विमद ऋषिरग्निर्देवत्यैकपदा विराट्च्छन्द: शान्तिकरने विनियोग्: I
ॐ भद्रङ नो अपि वातय नम: II ॐ शान्ती शान्ती शान्ती II
সুর্যার্ঘ্য – सूर्यार्घ्य –SURYAAGHYA
ইহার পর নিন্মলিখিত মন্ত্র বলিয়া সুর্যদেবকে অর্ঘদ্রব্য বা কেবলমাত্র জলদ্বারা সুর্যার্ঘ্য দিয়া নমস্কার করিবে সুর্যর্ঘ্যদান মন্ত্র: যথা -
ॐ नमो विवस्वते, ब्रम्मन भास्वते, विष्णु तेजसे, जगत सबित्रे, शुचये सबित्रे, कर्मदायिने इदमर्घ्यंग ॐ श्रीसूर्याय नम: I
সূর্য্য প্রনাম -सूर्य प्रणाम- SURYA PRANAAM
ॐ जवाकुसुमसंकाशंग काश्यपेयंग महाद्युतिम I धाव्न्तारिंग सर्बपापघ्नंग प्रनतोस्मी दिवाकरम I ॐ नमो भगवते श्रीसुर्याय: नम:
ॐ नम: सबित्रे जगदेक चक्षुसे जगत-प्रसूति स्थितिंग नाश हेतबे त्रयीमयाय त्रिगुनात्मधारिने विरिन्ची नारायाने शंकरात्मने II
ত্রুটি মার্জনা - त्रुटी मार्जना
অনন্তর গায়ত্রী দেবীকে এক গন্ডুস (এক অঞ্জলি) জল দিয়া ত্রুটি মার্জনা করিবেন I
ॐ यदाक्षरंग परिभ्रष्ठंग मात्रहिनश्च यद्भवेद I पुर्नंग भवतु तत सरबंग तद्प्रसादात सुरेश्वरी II
তারপর নিন্ম লিখিত মন্ত্রে দেবতা ও ব্রাম্মন দিগকে প্রনাম করিবে I
ॐ आ सत्यलोकादा पातालादा लोकालोकपर्व्वतात I
ये सन्ती ब्रम्म्णा देवास्तेभ्यो नित्यङ नमो नम: II
ইতি ঋগ্বেদীয় সন্ধ্যা পদ্ধতি সমাপ্ত